बुधवार, अप्रैल 07, 2010

गीत- ठीक नहीं लगता

गीत
ठीक नहीं लगता
वीरेन्द्र जैन


पीसा सारी रात मगर बारीक नहीं लगता
जाने कैसा कैसा लगता ठीक नहीं लगता

जीवन की गाड़ी कुछ भारी भारी चलती है
ऐसे चलती है जैसे लाचारी चलती है
जो दिल में बैठा वो भी नजदीक नहीं लगता
जाने कैसा कैसा लगता ठीक नहीं लगता

ना 'हां' लिक्खा, ना 'ना' लिक्खा, मेरी अर्जी पर
सारा आगत रुका हुआ है , उनकी मर्जी पर
सुर में बजता जीवन का संगीत नहीं लगता
जाने कैसा कैसा लगता ठीक नहीं लगता

वीरेन्द्र जैन
2\1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

शुक्रवार, अप्रैल 02, 2010

एक ग़ज़लनुमा रचना- हवाओं ने हवाओं को हवा दी

एक गज़ल नुमा रचना
हवाओं ने हवाओं को हवा दी


वीरेन्द्र जैन

बयारें थीं उन्हें आँधी बता दी
हवाओं ने हवाओं को हवा दी


गयी जड़ से न बीमारी तुम्हारी
दबाओं ने अभी बेशक दबा दी


हमें तब तब हुये फोड़े कि जब जब
फलो फूलो, बुजर्गों ने दुआ दी


जिसे विश्वास से पतवार सौंपी
उसी ने बीच में किश्ती डुबा दी


हमारे होश तब से फाख्ता हैं
कि जब से आपने चिलमन उठा दी


वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

गुरुवार, अप्रैल 01, 2010

एक गज़लनुमा रचना---------------------------------- धार क्या खाक मोड़ता यारो


एक गज़लनुमा रचना
धार क्या खाक मोड़ता यारो!
वीरेन्द्र जैन
हाथ दरिया के जोड़ता यारो
धार क्या खाक मोड़ता यारो


फैंक दी आखिर मैंने चादर ही
पाँव कब तक सिकोड़ता यारो


मुझको कस्तूरी मिल गई बरना
रोज़ वन वन में दौड़ता यारो


दर असल वो तो मेरी आदत थी
मैं उसे कैसे छोड़ता यारो


मन वचन कर्म से दिगम्बर था
क्या नहाता निचोड़ता यारो


वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629



बुधवार, मार्च 31, 2010

एक गज़लनुमा रचना-------------------------- मगर जो छोड़ा वो भी घर नहीं था

एक गज़लनुमा रचना
वीरेन्द्र जैन


जहाँ पहुँचा वहाँ छप्पर नहीं था
मगर जो छोड़ा वो भी घर नहीं था

मुसीबत आई तो, यारी भी छूटी
वो घर होकर भी, अपने घर नहीं था

किनारा हाथ में आता तो कैसे
मैं उत्सुक था मगर तत्पर नहीं था

मुझे तुम नाम लेकर के पुकारो
मैं जब था, तब भी तो अफसर नहीं था

कहा तो कान में उसने था लेकिन
हमारा पाँव धरती पर नहीं था

उसे उम्मीद क्यों थी नौकरी की
किसी का हाथ जो सर पर नहीं था

न वो आयी, न मुझको नींद आयी
ये बिस्तर था मुँआं, दफ्तर नहीं था

उसे तो छोड़ना ही छोड़ना था
वो नौकर था कुई शौहर नहीं था

जहाँ कातिल ही मुंसिफ हो गये हों
वहाँ इल्ज़ाम किस किस पर नहीं था

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

शनिवार, मार्च 13, 2010

गीत - सूरज चाँद पहाड़ नदी सबसे सम्बन्ध हुआ



सूरज चांद पहाड़ नदी सबसे सम्बन्ध हुआ

वीरेन्द्र जैन

जब तक घर था
मैं निर्भर था
अब निर्बन्ध हुआ
सूरज चांद पहाड़ नदी
सब से सम्बन्ध हुआ

सीमित था जब तक जीवित था
रिश्तों को ढोकर
फैल गया मैं कितना कितना
अपनों को खोकर
शीशी फूटी, इत्र फैल सर्वत्र सुगन्ध हुआ
सूरज चांद पहाड़ नदी सबसे सम्बन्ध हुआ

अब आया ये समझ,
हवा इतना इठलाती क्यों
अब मैंने जाना ये नदिया
कल कल गाती क्यों
तभी हो सका आनन्दित जिस रोज अनन्त हुआ
सूरज चांद पहाड़ नदी सबसे सम्बन्ध हुआ


वीरेन्द्र जैन
2/1शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

बुधवार, मार्च 03, 2010

कुछ अहसान साथ ले जाना

कुछ अहसान साथ ले जाना
वीरेन्द्र जैन


सबके कर्ज़ चुका मत देना
कुछ अहसान साथ ले जाना

कभी बुआ ने करी गुदगुदी
चाचाजी ने खूब हँसाया
दादाजी ने घोड़ा बन कर
कभी पीठ पर तुम्हें बिठाया
इस उधार पर चलती दुनियाँ
ऐसे दान साथ ले जाना
सबके कर्ज़ चुका मत देना
कुछ अहसान साथ ले जाना
बिजली छूने वाले थे जब
बड़े भाई ने जड़े तमाचे
दोस्त तुम्हारी शादी में जब
दिल की गहराई से नाचे
मुर्दा होकर मत मर जाना
थोड़ी जान साथ ले जाना
सब के कर्ज़ चुका मत देना
कुछ अहसान साथ ले जाना

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

शनिवार, दिसंबर 12, 2009

एक गज़लनुमा रचना- हमीं ने काम कुछ ऐसा चुना है

एक गज़लनुमा रचना
हमीं ने काम कुछ ऐसा चुना है
वीरेन्द्र जैन

हमीं ने काम कुछ ऐसा चुना है
उधेड़ा रात भर दिन भर बुना है
न हो संगीत सन्नाटा तो टूटे
गज़ल के नाम पर इक झुनझुना है
समझते खूब हो नज़रों की भाषा
मिरा अनुरोध फिर क्यों अनसुना है
तुम्हारे साथ बीता एक लम्हा
बकाया उम्र से लाखों गुना है
जहाँ पर झील में धोया था चेहरा
वहाँ पानी अभी तक गुनगुना है
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629

मंगलवार, नवंबर 17, 2009

गज़ल - फूल एक भी नहीं खिल सका



एक गजलनुमा रचना
वीरेन्द्र जैन
फूल एक भी नहीं खिल सका पौधे अपरंपार लगे
शेर नहीं ढूंढे मिलता है गजलों के बाजार लगे
तेरे मेरे मन के रिश्ते बरसों बरस पुराने हैं
पर जब जब दीदार हुआ तो नये नये हर बार लगे
टंगी हुयी हैं रंगबिरंगी विद्युत बल्बों की लड़ियाँ
जगमग ये तब ही होंगीं जब धाराओं से तार लगे
सुविधाओं के अम्बारों में खाली खाली लगता था
एक खुशी जब से आयी है भरा भरा घर द्वार लगे
ये तेरा रूमाल एक छोटा कपड़े का टुकड़ा है
मेरे हाथ लगा है जब से हाथों में अंगार लगे
गहनों के जैसी होती थीं किसी जमाने में गजलें
लेकिन मेरे हाथों में आयी हैं तो हथियार लगे

रविवार, अगस्त 23, 2009

जाने कितने साल हो गए खुल कर हँसे हुए

अब तो सुबह शाम रहते हैं
जबड़े कसे हुये
जाने कितने साल हो गये
खुल कर हंसे हुये

हर अच्छे मजाक की कोशिश
खाली जाती है
हंसी नाटकों में पीछे से
डाली जाती है
कांटे कुछ दिल से दिमाग तक
गहरे धंसे हुये
जाने कितने साल हो गये
खुल कर हंसे हुये


खा डाले खुदगर्जी ने
गहरे याराने भी
'आप-आप' कहते हैं अब तो
दोस्त पुराने भी
मेहमानों से लगते रिश्ते
घर में बसे हुये
जाने कितने साल हो गये
खुल कर हंसे हुये

मंगलवार, जून 30, 2009

फिर से स्कूल खुल गये

गीत

धुले धुले मुखड़े, उजली उजली पोषाकें
राहों में रंग घुल गये
फिर से स्कूल खुल गये

रास्ते गये चहक चहक
भोली सी फुदकती महक
मैदानों के सोये दिल
आज फिर उछल उछल गये
फिर से स्कूल खुल गये

किलकारी मोद भर गयी
कक्षा की गोद भर गयी
सन्नाटा भाग गया जब
कानों में शोर गुल गये
फिर से स्कूल खुल गये

वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र
फोन 9425674629