मंगलवार, नवंबर 17, 2009

गज़ल - फूल एक भी नहीं खिल सका



एक गजलनुमा रचना
वीरेन्द्र जैन
फूल एक भी नहीं खिल सका पौधे अपरंपार लगे
शेर नहीं ढूंढे मिलता है गजलों के बाजार लगे
तेरे मेरे मन के रिश्ते बरसों बरस पुराने हैं
पर जब जब दीदार हुआ तो नये नये हर बार लगे
टंगी हुयी हैं रंगबिरंगी विद्युत बल्बों की लड़ियाँ
जगमग ये तब ही होंगीं जब धाराओं से तार लगे
सुविधाओं के अम्बारों में खाली खाली लगता था
एक खुशी जब से आयी है भरा भरा घर द्वार लगे
ये तेरा रूमाल एक छोटा कपड़े का टुकड़ा है
मेरे हाथ लगा है जब से हाथों में अंगार लगे
गहनों के जैसी होती थीं किसी जमाने में गजलें
लेकिन मेरे हाथों में आयी हैं तो हथियार लगे

8 टिप्‍पणियां:

  1. गहनों के जैसी होती थीं किसी जमाने में गजलें
    लेकिन मेरे हाथों में आयी हैं तो हथियार लगे

    VAAH ...... BAHUT SUNDAR PRASTUTI .... AAJ KA SATY HAI YE .. AB GAZLEN SAMAY KE ANUSAAR BADAL GAYEE HAIN ... SHRANGAAR SE NIKAL KAR TALWAAR BAN GAYEE HAIN .....

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  2. फूल एक भी नहीं खिल सका पौधे अपरंपार लगे
    शेर नहीं ढूंढे मिलता है गजलों के बाजार लगे
    बेहतरीन रचना . भावपूर्ण

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  3. फूल एक भी नहीं खिल सका पौधे अपरंपार लगे
    शेर नहीं ढूंढे मिलता है गजलों के बाजार लगे
    तेरे मेरे मन के रिश्ते बरसों बरस पुराने हैं
    पर जब जब दीदार हुआ तो नये नये हर बार लगे
    वाह लाजवाब शेर हैं बधाई

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  4. तेरे मेरे मन के रिश्ते बरसों बरस पुराने हैं
    पर जब जब दीदार हुआ तो नये नये हर बार लगे

    ये तेरा रूमाल एक छोटा कपड़े का टुकड़ा है
    मेरे हाथ लगा है जब से हाथों में अंगार लगे

    वाह वीरेंदर जी वाह....बेहद खूबसूरत शेरोन से सजी आपकी ये ग़ज़ल दिल में घर कर गयी...हर शेर अपने आपमें मुकम्मल और कमाल का है...मेरी दिली दाद कबूल करें...
    नीरज

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  5. wah wah wah , sabhi sher bemisaal.............

    ye tera rumaal...............

    tere mere man ke .............

    wah bahut khoob.

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  6. बहुत प्रभावशाली और प्रवाहशील गजल /रचना
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    http://kumarzahid.blogspot.com

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